
ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (AIMIM) के प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी ने सार्वजनिक स्थानों पर नमाज पढ़ने और अन्य धार्मिक गतिविधियों पर रोक लगाने को लेकर केंद्र और राज्य सरकारों पर तीखा हमला बोला है। ओवैसी ने इस पूरे मामले में ‘दोहरे मापदंड’ (Double Standards) का आरोप लगाते हुए कहा है कि अगर सड़कों पर नमाज पढ़ना गलत है, तो फिर हर धर्म के त्योहारों और जुलूसों पर भी रोक लगनी चाहिए
हाल ही में उत्तर प्रदेश और पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों में सड़कों पर नमाज न पढ़ने या उनका स्थान बदलने के फैसलों के बाद ओवैसी का यह बयान सामने आया है, जिसने देश की राजनीति में एक बार फिर धार्मिक स्वतंत्रता और सार्वजनिक व्यवस्था पर नई बहस छेड़ दी है।
“अनुच्छेद 25 का हवाला: अधिकार सबके लिए बराबर होने चाहिए”
ओवैसी ने भारतीय संविधान के अनुच्छेद 25 (धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार) का जिक्र करते हुए कहा कि कानून सबके लिए एक समान होना चाहिए। उन्होंने सवाल उठाया कि जब बात मुस्लिम त्योहारों की आती है तो नियम सख्त कर दिए जाते हैं, जबकि अन्य आयोजनों की अनदेखी की जाती है।
सड़कों पर उत्सव: ओवैसी ने तर्क दिया कि भारत एक ऐसा देश है जहाँ हर धर्म के त्योहार, शोभायात्राएं और जुलूस सड़कों पर ही मनाए जाते हैं। उन आयोजनों के दौरान भी यातायात प्रभावित होता है, लेकिन तब अधिकारी अपनी आँखें मूंद लेते हैं। उन्होंने स्पष्ट किया कि सड़कों पर नमाज हर रोज नहीं होती। यह स्थिति केवल शुक्रवार (जुमे) की नमाज या साल में दो बार आने वाली ईद के मौके पर ही बनती है, क्योंकि मस्जिदों के भीतर जगह कम पड़ जाती है। विभिन्न राज्यों में हिंदू त्योहारों (जैसे नवरात्रि या कांवड़ यात्रा) के दौरान अंडे, मांस और चिकन की बिक्री पर लगाए जाने वाले प्रतिबंधों पर भी ओवैसी ने कड़ा ऐतराज जताया। उन्होंने इसे एकतरफा नीति करार दिया।
ओवैसी का तीखा तर्क:
रमजान के पवित्र महीने के 30 दिनों के लिए पूरे देश में शराब की दुकानें भी बंद कर दी जानी चाहिए। आखिर यह किस तरह का कानून है जो सिर्फ एक समुदाय पर लागू होता है?”
AIMIM प्रमुख ने आरोप लगाया कि जब भी रमजान या बकरीद जैसे बड़े मुस्लिम त्योहार नजदीक आते हैं, तो अजान और नमाज से जुड़े मुद्दों को जान-बूझकर हवा दी जाती है ताकि ध्रुवीकरण किया जा सके।
ओवैसी ने कहा कि लोगों को प्रधानमंत्री के लंबे भाषणों और उनके कारण लगने वाले ट्रैफिक जाम से कोई आपत्ति नहीं होती, लेकिन कुछ मिनटों की नमाज उन्हें खटकने लगती है। उन्होंने आरोप लगाया कि यह पूरी कवायद मुसलमानों को दबाने, उन्हें हाशिए पर धकेलने और देश में ‘दूसरे दर्जे का नागरिक’ (Second-Class Citizen) बनाने की कोशिश का हिस्सा है।
क्या है इस पूरे विवाद की पृष्ठभूमि?
ओवैसी का यह बयान हाल ही में दो बड़े घटनाक्रमों के बाद आया है, जिन्होंने इस राजनीतिक बहस को तेज कर दिया है:
उत्तर प्रदेश (सीएम योगी आदित्यनाथ का बयान)
उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने हाल ही में निर्देश दिए थे कि नमाज एक तय और व्यवस्थित तरीके से ही पढ़ी जानी चाहिए। उन्होंने सुझाव दिया था कि अगर मस्जिद में जगह कम है और भीड़ ज्यादा है, तो लोगों को होने वाली असुविधा और ट्रैफिक जाम से बचने के लिए नमाज को अलग-अलग शिफ्टों (सत्रों) में पढ़ा जा सकता है, लेकिन सड़कों को ब्लॉक नहीं किया जाना चाहिए।
पश्चिम बंगाल (रेड रोड पर ईद की नमाज का स्थान बदलना)
पश्चिम बंगाल में भी इस बार एक बड़ा बदलाव देखने को मिला। कोलकाता की ऐतिहासिक रेड रोड पर होने वाली पारंपरिक ईद की जमात को इस बार वहां आयोजित करने की अनुमति नहीं दी गई। प्रशासन ने कानून-व्यवस्था और यातायात को सुचारू रखने के लिए इस बड़ी प्रार्थना सभा को ब्रिगेड परेड ग्राउंड में शिफ्ट कर दिया, ताकि नमाज सड़कों पर न फैले। सड़कों और सार्वजनिक स्थानों पर धार्मिक आयोजनों को लेकर प्रशासन का तर्क हमेशा से सार्वजनिक सुरक्षा और यातायात प्रबंधन का रहा है। लेकिन असदुद्दीन ओवैसी के इस बयान ने इस प्रशासनिक कदम को एक नया राजनीतिक और सामाजिक मोड़ दे दिया है, जहां बहुसंख्यक और अल्पसंख्यक अधिकारों की समानता पर सवाल खड़े किए जा रहे हैं.



